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वायदे और विदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिस ताबडतोड ढंग से विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू किया वह आश्‍चर्यजनक हैं, आम चुनावो के दौरान जिस चेहरे ने देश में घूम घूम कर ये बताया की पिछले शासक दलो ने साठ पैसठ सालो में देश को लूट लूट कर कंगाल कर दिया, उसी ने सत्‍ता पर काबिज होते ही उसी कंगाल देश के सरकारी खजाने से महज एक्‍ साल में 20 देशों की राजकीय यात्रा की है। आरटीआई के हवाले से इन महज 16 देशों में भारतीय दूतावासों की ओर से 37.22 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। अभी चार देशों ने जानकारी नहीं हैं, इसमें   फ्रांस , जर्मनी, कनाडा, चीन , मंगोलिया और दक्षिण कोरिया की यात्रा में, फ्रांस से राफेल विमान खरीदेने और कनाडा से यूरेनियम पर करार महत्‍वपूर्ण रहा, पर अभी भी ये कहा जा सकता हैं कि भारत में निवेश लिवा लाने की पुरजोर कोशिश ज्‍यादा सफल होती नही दिखती ,‍इधर दे श के लोग अब चुनावी खुमारी ने निकल कर सत्‍ता परिवर्तन के नफे नुकसान के अंक गणित में लग गऐ हैं, इन दौरो पर शुरूवाती तौर पर जो तर्क दिये गऐ उससे कही चीन,पाकिस्‍तान और अमेरिका के व्‍यवहार में कोई सुधार होता नही दिखा, अमेरिका ...

सोशल मीडिया का संशय .......

सोशल मीडिया का संशय ....... ................... पिछले दिनो कुछ भक्‍तो की लगातार गाली गलौज व धमकी से तंग आकर एन डी टी वी के पत्रकार रविश कुमार ने अपने टिव्‍टर और फेसबुक एकाउण्‍ट ही बंद कर दिया , लगभग इसी समय खबर आती हैं कि जी टी वी के उस पत्रकार को जेड श्रेणी की सुरक्षा मिल जाती हैं जिसे जिंदल ग्रुप से पेड न्‍यूज के लिऐ एक करोड रूपये मांगने के आरोप में जेल की सजा भी मिल चुकी हैं, खबर ये भी हैं कि व्‍‍हाट शाप,‍ टिव्‍टर और फेसबुक एकाउण्‍ट पर सरकार नजर ही नही रखेगी बल्कि नब्‍बे दिनो तक इनके मैसेज मिटाऐ नही जा सकेगें ,,,,,,,,,, सोशल मीडिया निश्‍चय ही प्रभावी तो हैं फेसबुक ,ट्विटर आदि साइट्स पर सक्रिय जनमानस समाज के ही विभिन्न तबकों ,विचारधाराओं के वे भडासी लोग हैं ही तो हैं, जो समाज और उसकी व्‍यवस्‍‍था पर नजर रखने के साथ साथ उसे टटोलने और कुरेदने का भी प्रयास करते हैं , जो प्रिंट मीडिया के दौर में संपादक के नाम पत्र लिखा करते थे और अपनी योग्‍यता, रूचि के अलावा अपनी देश, समाज के लिऐ कुछ करने की तमाम इच्‍छा एक संपादक की भरोसे सिमट कर रह जाती थी , जिस पर संपादक का सहमत होना जरूरी होता था, अ...

खूनी राष्ट्रवाद, हत्यारा धर्म और साम्प्रदायिक संस्था के बीच का लेखक ........

समाज के भीतर सत्ता , धर्म , और राजनीति की बुराइयों को उजागर करने वाला सिर्फ लेखक ही होता है। जिसके विचारों से ही आमजनो में अधिकारबोध और सत्‍ता में दायित्‍व बोध जाग्रत होता हैं , और इसलिऐ   जनता को गुलाम समझने वाली सामंती सत्‍ता लेखक हमेशा खटकता रहता हैं , सच्चा लेखक वही लिखता है जो जनता के पक्ष में लिखा जाना चाहिए। दरअसल अन्‍याय के प्रति आत्‍मबल तो सब में होता हैं पर उसे जाग्रत करने का मार्ग एक कलम द्वारा ही प्रशस्‍त किया जाता हैं , पिछले 30 अगस्‍त साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित एक बुजुर्ग कन्नड़ लेखक माल्‍लेशप्‍पा एम कालबुर्गी की गोली मार कर हत्‍या कर दी गई , क्‍या इसके पीछे वो   साम्राज्यवादी सत्ता नही हो सकती जो क्रान्ति - पथ पर भय का अंधेरा कायम रखना चाहती हैं ...... ?       अफसोस की यह हत्‍या भी समाज में किसी बैचेनी को जन्‍म न दे सकी, तमाम राजनीतिक खेमे के लिऐ प्रतिबद्व लेखक जमात भी बस औपचारिकता का निर्वाह करते हुऐ अपनी अपनी भारतीय मीडिया की तरह   शीना की हत्या, इंद्राणी की ग्‍लेमरस कथा, राधे मां की मतबाली में लगे हैं ,सामना तो...

मीडिया से तार तार होती हमारी मर्यादाऐ .

      मीडिया से तार तार होती हमारी मर्यादाऐ .............................. इंद्राणी , पीटर , खन्ना , शीना , राहुल के लगातार चल रहे समाचारो से एकाएक सत्‍यक‍‍‍था, मनोहर कहानीयां, रंगीन कहानीया सब याद आ रही हैं, पर अफसोस इन किताबो के दौर में  धर्मयुग, दिनमान पढने वाली वो जमात जो सत्‍यक‍‍‍था किस्‍म्‍ की किताब पढने वालो को डपटती रहती थी वह बेबसी के सा‍थ अब सिमटती जा रही हैं, इंद्राणी मुखर्जी की गिरफ्तारी को जिस तरह से चैनलों और अखबारों में कवरेज मिल रहा है , वो कोई पहली बार नहीं हो रहा। पहले भी इसी तरह के कवरेज को लेकर लंबे लंबे लेख लिखे जा चुके हैं। दरअसल चैनल वाले ये मान चुके हैं कि दर्शको को देश विकास और भष्‍टाचार के समचारो में अंतर ही नही समझ नही आता और न ही नेताओ के वादो इरादो पर भरोसा रहता हैं और वह तमाम मेहनत के बाद टी वी के सामने बैठकर कनफूजियाने के बजाय व‍ह इंद्राणी मुखर्जी की तैरती रंगीन तस्वीरों से आंखें सेंकने और तरह तरह के किस्सों से हाय समाज हाय ज़माना कर बतियाने का मौका छोडना चाहता हैं,पर इन समाचारो का चमत्‍कार देखिऐ की पारिवारिक कल‍ह, व्‍याभिचार और हत्...

साहित्‍यकार- पुछा जाऐ तो अकड जाते हैं न पुछा जाऐ तो बिगड जाते हैं,

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गर्व और ग्लानि की आधार भूमि पर हर आयोजन की अपनी व्यवस्‍‍था और सीमाऐ होती है, जो उसके उत्‍साह, उल्‍लास और सफलता के लिऐ सुनिश्चत की जाती हैं, रायपुर में आयोजित साहित्‍य महोत्‍सव कार्यक्रम से निश्‍चय ही प्रदेश की आबोहवा में रचनात्‍मक महक तो फैली ही हैं, इसके लिऐ आयोजक मंडल धन्‍यवाद का पात्र हैं, साहित्‍य को लेकर इस मनोविज्ञान को आज के संदर्भ में कतई नकारा नही जा सकता की साहित्‍यकार को पुछा जाऐ तो अकड जाते हैं न पुछा जाऐ तो बिगड जाते हैं, लेखकों को बुलाने या नहीं बुलाने और बुलाने पर जाने या नहीं जाने की पीछे बहुत सारे तर्क हो सकते हैं , मैं यकीनन कह सकता हूं कि पारस्परिक संबंधो की गुजाइंश के साथ व्यक्तिगत और संगठन के रूप में किसे बुलाया जाऐ किसे न बुलाया जाय का निर्णय कतर्ड आयोजक के मौलिक अधिकार नही हो सकता जब आयोजन सरकारी खजाने से हो, कयोकी यह पैसा हर एक नागरिक का हैं, किसने किस को बुलाया और कौन गया नहीं गया, किस आधार आना जाना हुआ कितना राजनैतिक और आर्थिक तडका लगा, ये नैतिक सवाल हैं जो कभी भी रणनिति का रूप ले सकता हैं, जानेवाले को क्या और किस तर्क से मिला, योग्‍यता से कितना तालमेल थ...
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सीता : शूर्पनखा बदायू में शौच के लिऐ गई जुडवां बहनो के रेप के बाद खेत के पेड पर लटकाने कि घटना पर जनाक्रोश में आश्‍चर्यजनक ठंडक देखने को मिली, मीडिया भी अखिलेश सरकार को इस तरह कोस रहा था जैसे फेल बच्‍चे के अभि‍भावक स्‍कूल प्रशासन को कोसते हैं, जिस तरह दोनो बच्‍चीया आर्थिक रूप से कमजोर, शहरी हवा से दूर,जीवन की बुनियादी अधिकार से वंचित रहते हुऐ पुरूषसत्‍ता का शिकार हो गई, निसंदेह वह हमारी समूचे सवा सौ करोड के लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा हैं जब हमारे पास प्रजातांत्रिक सरकार है , पुलिस है ,  कानून व्यवस्था है ,  विश्व की सबसे ज्‍यादा अनुभवी और गौरवशाली सभ्यता है ,  सबसे बडा और परिपक्‍व संविधान है , हम हजारो करोड खर्च करके सरकार बनाते हैं और वह इस तरह कि घटना की वजह से निकम्‍मी और बेकार दिख रही हैं,  लोगो की बुनियादी जरूरते मसलन स्‍वास्‍‍थ, शिक्षा, रोजगार सडक शौचालय तक नही दे सकती हैं, राजनैतिक की राजशाही सोच ऐसी की सायकल लेपटाप, सस्‍ते चावल, मोबाइल बाटकर अपना पालतू  वोटर बना रहे हैं, क्‍या ये हमारे प्रसाशनिक ढिलाई का नमूना नही कि जिस वर्दी को देख कर पुरा गांव ...
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गंगा तू बुलाती ही क्‍यों हैं ........... ? गंगा में नहाने के लिए लाखों लाख लोग आते हैं , मान्‍यता हैं कि गंगा में इुबकी लगाऐ बिना तो स्‍वर्ग में प्रवेश ही नही मिलेगा हैं, यहां अमीर गरीब का भी अनोखा मनोविज्ञान काम करता हैं, एक तबका अपने स्‍तर पर तो बडे शान शौकत से रहता हैं गली मोहल्‍लो के नाली नालो को देखते ही नाक सिकोड लेता हैं रूमाल से शक्‍ल छुपा लेता हैं पर गंगा के पास आते ही ये जानते हुऐ भी की पुरा किया धरा मल मुर्दा मटेरियल इसी गंगा में हैं, फिर भी बडे उत्‍साह के साथ एक नही सात सात बार डुबकी लगाते हुऐ यह मान लेते है कि तमाम पाप बसा धुल ही गऐ , इसी तरह अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से कमजोर नाली नालो के किनारे गली बस्‍ती में रहने वाले भी उसी उत्‍साह और आस्‍था से डुबकी लगा कर महसूस करते है की उसने तो पुण्‍य पा ही लिया, बडी श्रद्वा से बोतल में भर कर घर ले जाते हैं और पुरे घर में छि‍टक छि‍टक कर महसूस करते है कि पति‍त पावन गंगा घर आ गई , चन्‍नार्मत में भी घोल घोल कर पीते हैं जबकी इसी पहले वर्ग के लोगो ने पाप खुद को तो धौया ही साथ ही तमाम अपनी व्‍यवसायिक गंदगी को भी इसी गंगा में बहा कर तिजो...