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मीडिया से तार तार होती हमारी मर्यादाऐ .

      मीडिया से तार तार होती हमारी मर्यादाऐ .............................. इंद्राणी , पीटर , खन्ना , शीना , राहुल के लगातार चल रहे समाचारो से एकाएक सत्‍यक‍‍‍था, मनोहर कहानीयां, रंगीन कहानीया सब याद आ रही हैं, पर अफसोस इन किताबो के दौर में  धर्मयुग, दिनमान पढने वाली वो जमात जो सत्‍यक‍‍‍था किस्‍म्‍ की किताब पढने वालो को डपटती रहती थी वह बेबसी के सा‍थ अब सिमटती जा रही हैं, इंद्राणी मुखर्जी की गिरफ्तारी को जिस तरह से चैनलों और अखबारों में कवरेज मिल रहा है , वो कोई पहली बार नहीं हो रहा। पहले भी इसी तरह के कवरेज को लेकर लंबे लंबे लेख लिखे जा चुके हैं। दरअसल चैनल वाले ये मान चुके हैं कि दर्शको को देश विकास और भष्‍टाचार के समचारो में अंतर ही नही समझ नही आता और न ही नेताओ के वादो इरादो पर भरोसा रहता हैं और वह तमाम मेहनत के बाद टी वी के सामने बैठकर कनफूजियाने के बजाय व‍ह इंद्राणी मुखर्जी की तैरती रंगीन तस्वीरों से आंखें सेंकने और तरह तरह के किस्सों से हाय समाज हाय ज़माना कर बतियाने का मौका छोडना चाहता हैं,पर इन समाचारो का चमत्‍कार देखिऐ की पारिवारिक कल‍ह, व्‍याभिचार और हत्...

साहित्‍यकार- पुछा जाऐ तो अकड जाते हैं न पुछा जाऐ तो बिगड जाते हैं,

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गर्व और ग्लानि की आधार भूमि पर हर आयोजन की अपनी व्यवस्‍‍था और सीमाऐ होती है, जो उसके उत्‍साह, उल्‍लास और सफलता के लिऐ सुनिश्चत की जाती हैं, रायपुर में आयोजित साहित्‍य महोत्‍सव कार्यक्रम से निश्‍चय ही प्रदेश की आबोहवा में रचनात्‍मक महक तो फैली ही हैं, इसके लिऐ आयोजक मंडल धन्‍यवाद का पात्र हैं, साहित्‍य को लेकर इस मनोविज्ञान को आज के संदर्भ में कतई नकारा नही जा सकता की साहित्‍यकार को पुछा जाऐ तो अकड जाते हैं न पुछा जाऐ तो बिगड जाते हैं, लेखकों को बुलाने या नहीं बुलाने और बुलाने पर जाने या नहीं जाने की पीछे बहुत सारे तर्क हो सकते हैं , मैं यकीनन कह सकता हूं कि पारस्परिक संबंधो की गुजाइंश के साथ व्यक्तिगत और संगठन के रूप में किसे बुलाया जाऐ किसे न बुलाया जाय का निर्णय कतर्ड आयोजक के मौलिक अधिकार नही हो सकता जब आयोजन सरकारी खजाने से हो, कयोकी यह पैसा हर एक नागरिक का हैं, किसने किस को बुलाया और कौन गया नहीं गया, किस आधार आना जाना हुआ कितना राजनैतिक और आर्थिक तडका लगा, ये नैतिक सवाल हैं जो कभी भी रणनिति का रूप ले सकता हैं, जानेवाले को क्या और किस तर्क से मिला, योग्‍यता से कितना तालमेल थ...
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सीता : शूर्पनखा बदायू में शौच के लिऐ गई जुडवां बहनो के रेप के बाद खेत के पेड पर लटकाने कि घटना पर जनाक्रोश में आश्‍चर्यजनक ठंडक देखने को मिली, मीडिया भी अखिलेश सरकार को इस तरह कोस रहा था जैसे फेल बच्‍चे के अभि‍भावक स्‍कूल प्रशासन को कोसते हैं, जिस तरह दोनो बच्‍चीया आर्थिक रूप से कमजोर, शहरी हवा से दूर,जीवन की बुनियादी अधिकार से वंचित रहते हुऐ पुरूषसत्‍ता का शिकार हो गई, निसंदेह वह हमारी समूचे सवा सौ करोड के लोकतंत्र के मुंह पर तमाचा हैं जब हमारे पास प्रजातांत्रिक सरकार है , पुलिस है ,  कानून व्यवस्था है ,  विश्व की सबसे ज्‍यादा अनुभवी और गौरवशाली सभ्यता है ,  सबसे बडा और परिपक्‍व संविधान है , हम हजारो करोड खर्च करके सरकार बनाते हैं और वह इस तरह कि घटना की वजह से निकम्‍मी और बेकार दिख रही हैं,  लोगो की बुनियादी जरूरते मसलन स्‍वास्‍‍थ, शिक्षा, रोजगार सडक शौचालय तक नही दे सकती हैं, राजनैतिक की राजशाही सोच ऐसी की सायकल लेपटाप, सस्‍ते चावल, मोबाइल बाटकर अपना पालतू  वोटर बना रहे हैं, क्‍या ये हमारे प्रसाशनिक ढिलाई का नमूना नही कि जिस वर्दी को देख कर पुरा गांव ...
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गंगा तू बुलाती ही क्‍यों हैं ........... ? गंगा में नहाने के लिए लाखों लाख लोग आते हैं , मान्‍यता हैं कि गंगा में इुबकी लगाऐ बिना तो स्‍वर्ग में प्रवेश ही नही मिलेगा हैं, यहां अमीर गरीब का भी अनोखा मनोविज्ञान काम करता हैं, एक तबका अपने स्‍तर पर तो बडे शान शौकत से रहता हैं गली मोहल्‍लो के नाली नालो को देखते ही नाक सिकोड लेता हैं रूमाल से शक्‍ल छुपा लेता हैं पर गंगा के पास आते ही ये जानते हुऐ भी की पुरा किया धरा मल मुर्दा मटेरियल इसी गंगा में हैं, फिर भी बडे उत्‍साह के साथ एक नही सात सात बार डुबकी लगाते हुऐ यह मान लेते है कि तमाम पाप बसा धुल ही गऐ , इसी तरह अपेक्षाकृत आर्थिक रूप से कमजोर नाली नालो के किनारे गली बस्‍ती में रहने वाले भी उसी उत्‍साह और आस्‍था से डुबकी लगा कर महसूस करते है की उसने तो पुण्‍य पा ही लिया, बडी श्रद्वा से बोतल में भर कर घर ले जाते हैं और पुरे घर में छि‍टक छि‍टक कर महसूस करते है कि पति‍त पावन गंगा घर आ गई , चन्‍नार्मत में भी घोल घोल कर पीते हैं जबकी इसी पहले वर्ग के लोगो ने पाप खुद को तो धौया ही साथ ही तमाम अपनी व्‍यवसायिक गंदगी को भी इसी गंगा में बहा कर तिजो...
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आम आदमी .................. पडोसी दादाजी महंगाई की बात करते हूऐ कहते हैं कि  जब मैं जवान थे तो बाल संवारने सजाने के लिऐ नाई को शौ‍क से 5 रुपया देता था । कुछ साल बाद आफिस क्‍लास बने रहने के लिऐ 20   रुपये देने लगा । लेकिन अब जब मेरे बाल लगभग गायब हो गए हैं और खुद भी रिटायर हूं तो 50 देने पड र‍हे हैं फिर भी उसकी शिकायत बनी ही र‍हती हैं की महंगाई बढ गई हैं , दरअसल समय समय पर बुनिया‍दी आवश्‍यकताओ की छोटी छोटी बढोतरी मीडिया और राजनैतिक बयानबाजी हमें झकझोरती भर है , मसलन व्‍यापक आधार के सा‍‍थ पैट्रोल और सब्‍जी के दाम बढने को लेकर कोसने के लिऐ हमारे पास सरकार नाम का ही एक विकल्‍प हैं , जब‍की विरोधाभाषी जीवन शैली और विसंगतियो से हम लापरवाह और अन्‍जान हैं  जो हमारे बजट का एक बड़ा हिस्सा खा रहा है। पिछले कुछ सालों में सभी लोगों , खासकर मिडल इन्कम ग्रुप को मिलने वाली सुविधाओं की बाढ़ सी आ गई हैं दरअसल आमदनी का बड़ा हिस्सा चार चीजों पर खर्च होता है। पहला बच्‍चो की पढाई , दूसरा लोन , तीसरा ट्रांसपोर्ट पर और चौ‍‍था इलेक्‍ट्रानिक ,  चिन्‍तन यहां से शुरू होता हैं कि बच्‍...

अखबार परिवार . विज्ञापन मैनेजर पुत्र और पत्रकार पुत्री .

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घर पर लंच टाइम में एक फोन आया, चौहान जी नमस्‍कार , सर दैनिक ................से बोल रहा हूं, सर कल एक ....................परिशिष्‍ट निकाल रहे थे, बास, कह रहे हैं आपका से छोटा सा विज्ञापन लगा लगाने को इसी जानकारी को देने के लिऐ फोन किया था, मैंने उसकी बात को नकारते हुऐ साफ शब्‍दो में कहा कि मेरा ऐसी परिशिष्‍ट से क्या लेना देना, पर वह बडे आत्‍मीयता से कहने लगा सर बस क्‍वाटर पेज का लगा रहा हूं जो बत्‍तीस हजार रुपये का ही  हैं, आपके लिऐ कौन सी बडी बात हैं, मैं सुनते ही सकपका गया 32000/... मैने कहा से तो मेरा साल भर का भी बजट नही हैं तो वह बीच का रास्‍ता निकालते हुऐ बास को मैनेज करने की दुहाई देते हूऐ 16000/ सेमी क्‍वाटर पेज की बात करने लगा, चूंकि मैं खाने की टेबल पर था, मैंने कडे शब्‍दो में ना करते हूऐ फोन बंद कर दिया करीब 40 मिनट बाद फिर उसी का फोन आया, सर बास आपसे बात करना चाहते हैं, और मेरे कुछ कहने से पहले ही, सर नमस्‍ते ,बालक कह रहा था आप नाराज हैं कुछ गलती हो गई क्‍या, बताइऐ, मैने कहा यार ऐसा कुछ नही हैं पर न तो मेरा ऐसा कोई व्‍यवसाय है जिसमें विज्ञापन की जरूरत हो और न मेरी...

कभी नऐ पाकेट में दे दें तुमको चीज पुरानी....

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पिछले दिनो बाजार से देख समझ कर लेने के बावजूद घर पर पहुचते ही श्रीमति ने अंगूर में खांमीया निकाल दी दरअसल हमने खरीदे तो कैप्‍सूल आकार के थे , पर घर पर प्‍लास्टिक खोलकर देखने पर कुछ तो मनमाफिक थे बाकी छोटे छोटे गंदे सडे दाने, अपनी इस करतूत पर हमें विश्‍वास नही हो रहा था और फल वाले की बाजीगरी गले नही उतर रही थी, हम दूसरे दिन फिर वही पहुंचें और मासूम फल वाले की बाजीगरी के आड में चल रहा बाजार का शातिर कारोबार देखकर दंग रह गऐ दरअसल वह काले रंग की प्‍लास्टिक में पहले ही छोटे गंदे सडे दाने, डाल कर रखता था फिर उसी में हमारी आपकी पंसद के कुछ अंगूर डाल के टिका देता था, इसी तरह ऐ बार हमारे प‍‍रीचित आम वाले ने तमाम आम सजा कर रखने के बाद भी देने से यह कह कर इन्‍कार कर दिया की बापकी लायक नही हैं केमिकल से पकाये गऐ हैं, जबकी चह बेच रहा था, खैर ये तो सच हैं कि व्‍यवसाय पांच्‍ की चीज को छ में बेचना नही रहा अब बाजार अब पांच से पचास करने का नाम हो गया हैं, फिर ये तो धंधा हैं भाई बात, दर्जन भर केले / अण्‍डे घर पर ग्‍यारह हो जाते हैं,किलो का तीन पाव, मूंगफली के पेस्‍ट से काजू बन जाना डोरा की अण्‍डरविय...