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Showing posts from October, 2015

सत्‍ता की मलाई से फिसलती जुबान

स्कूल के दौरान हिन्दीू का एक निबंध बार बार याद आता हैं कि अगर मैं प्रधानमंत्री होता......इसके पीछे हमारे गुरुजनो का यही मनोविज्ञान रहता होगा की हम जनप्रतिनिधियो के आचार विचार रहन सहन के सा‍थ उनकी समाज के प्रति जीवटता ,उत्त र दायित्वव, संवेदना और व्ययवहारिक बोलचाल को न सिर्फ समझे बल्कि जीवन में इसका अनुष्सतरण किया जा सके क्योहकी प्रजातात्रिक देश की राजनीति में जनप्रतिनिधियों का बडा महत्वि होता हैं और ये देश के सयाने माने जाते हैं ,पर तब बड़ी बेशर्मी महसूस होती है जब ये लगता है कि हमने ही बेशर्म और बदजुबान लोगों को भी चुनकर अपना भाग्य निर्माता बना दिया है। संतोष भी होता है तब जब इस तरह के लोगों को जनता भी उनके ही अंदाज में गरियाते हुए खदेड़ देती है। इन सब बातों से यह तो तय है कि चीजें इस तरह नहीं चलेंगी, नहीं चलनी चाहिए। प्रेस को प्रेस्टियूट बताने वाले केंद्रीय मंत्री वीके सिंह ने विवादित बयान दिया है। हरियाणा में दलित बच्चों को जिंदा जलाकर मारे जाने की वारदात पर उन्होंने कहा है कि अगर कोई कुत्ते पर पत्थर मारता है तो इसमें सरकार की कोई जवाबदेही नहीं बनती है।इस बीच गृह राज्य मंत्री किर

सत्‍ता, संगठन और संस्‍‍था से जूझता साहित्‍यकार ...........

साहित्य   अकादमी अवार्ड, सर्वोच्च साहित्य स म्मान है, जो लेखनी के धनी व्यक्ति को भारत सरकार द्वारा शिला पटट के साथ एक लाख रुपये दे कर स म्मानित किया जाता हैं ... साहित्‍य को कविता / कहानी में देखने वाले कुछ लोग सहित शब्द को ताक में रखकर साहित्‍य में अपनी सुविधानुसार विचारवस्‍तु को टटोल रहे हैं, और इसी वजह से साहित्‍य में समाहित सहित, अपने आचरण के ठीक विपरीत विभाजन की बात करता प्रतीत हो रहा हैं ,निश्‍चय ही हम प्रेमी हैं तो ईष्‍यालु भी हैं, जिम्मेदार तो लापरवाह भी. क्षेत्रीय हैं तो राष्ट्रीय भी, य‍‍थायोग अपने बदलते भाव से साहित्य के माध्यम से हमारा मानव मन , समाज-देश एवं संबंधों की जटिलताओं को भी सटीकता से व्यक्त कर सकता हैं ,यह  इतना आसान नहीं होता. साहित्य इस प्रक्रिया को सुगम्य बनाता है. परस्पर विरोधी भावनाओं को उकेरते हुऐ समय एवं स्थान की मर्यादा सुरक्षित कर जटिलताओं को धारावाह रूप से पाठक के समक्ष शिद्दत से पेश करने का काम केवल साहित्य कर सकता हैं. नायक नायिका और प्रकृति के अलावा भी  समाज के प्रति संवेदना,सजगता, समरसता और सर्तकता में ही साहित्‍य की सफलता के बा‍वजूद साहित्य

धार्मिक उन्‍माद में लहलहाती सत्‍ता की फसल ...

  .     एक गैरराजनैतिक, लगातार जिन्‍दगी से जुझते मध्‍यमवगींय आम आदमी का ये सवाल ,क्‍या सच में खौफनाक बन चुकी आज की राजनीति को कोई भी चुनौती देने की हिम्मत नही जुटा पा रहा. की शिनाख्‍त करते हुऐ मैं भी बेबस सा महसूस कर रहा हैं, देश के बुनियादी सवालो पर सरकार की नीति के अच्‍छे दिन का कुछ इंतजार किया जा सकता हैं  पर सरकार की नियत से पनप रहे अलगाव और अस‍हमति को तो नही रोका जा सकता,पडोसी देश के फिरकापरस्‍तो और देश के नक्‍सलवाद क्‍या कम तकलीफदेह हैं, जो हम बार बार कुछ अतिमहत्‍वकांक्षी उन्‍मादी गिरो‍ह के सांप्रदायिकता की चपेट में आ जाते हैं, अफसोस की इनके पीछे भी सत्‍ता की ही महत्वकाक्षा काम करती हैं ,सं प्रदायिकता मनुष्यता के विरोध से ही शुरू होती है। मनुष्य मनुष्य के प्रति विश्वास और प्रेम के स्थान पर अविश्वास और घृणा घोल दी जाती     है । पूर्वाग्रह और अफवाहे इस विरोध और घृणा के लिए खाद     पानी     का     काम     करते     है । सांप्रदायिक उन्माद बढ़ने पर धर्मिक उत्तेजना बर्बर की स्थितियों को जन्म देती है। जहां हम यथार्थ को समग्रता में न देखकर खंड-खंड में देखना शुरू कर देते     है,

वायदे और विदेश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव जीतने के तुरंत बाद जिस ताबडतोड ढंग से विदेश यात्राओं का सिलसिला शुरू किया वह आश्‍चर्यजनक हैं, आम चुनावो के दौरान जिस चेहरे ने देश में घूम घूम कर ये बताया की पिछले शासक दलो ने साठ पैसठ सालो में देश को लूट लूट कर कंगाल कर दिया, उसी ने सत्‍ता पर काबिज होते ही उसी कंगाल देश के सरकारी खजाने से महज एक्‍ साल में 20 देशों की राजकीय यात्रा की है। आरटीआई के हवाले से इन महज 16 देशों में भारतीय दूतावासों की ओर से 37.22 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। अभी चार देशों ने जानकारी नहीं हैं, इसमें   फ्रांस , जर्मनी, कनाडा, चीन , मंगोलिया और दक्षिण कोरिया की यात्रा में, फ्रांस से राफेल विमान खरीदेने और कनाडा से यूरेनियम पर करार महत्‍वपूर्ण रहा, पर अभी भी ये कहा जा सकता हैं कि भारत में निवेश लिवा लाने की पुरजोर कोशिश ज्‍यादा सफल होती नही दिखती ,‍इधर दे श के लोग अब चुनावी खुमारी ने निकल कर सत्‍ता परिवर्तन के नफे नुकसान के अंक गणित में लग गऐ हैं, इन दौरो पर शुरूवाती तौर पर जो तर्क दिये गऐ उससे कही चीन,पाकिस्‍तान और अमेरिका के व्‍यवहार में कोई सुधार होता नही दिखा, अमेरिका पाकि